Loading...

Chemical Bonding | रासायनिक आबंधन

July 17, 2026 |

रासायनिक आबंधन (Chemical Bonding) रसायन विज्ञान का वह मूलभूत आधार है, जो यह स्पष्ट करता है कि परमाणु आपस में मिलकर अणु (Molecules) कैसे और क्यों बनाते हैं। परमाणुओं की स्वतंत्र अवस्था में ऊर्जा अधिक होती है, अतः वे एक-दूसरे से जुड़कर अपनी ऊर्जा कम करने और अधिक स्थायित्व (Stability) प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

इस लेख में हम रासायनिक आबंधन के दो सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक सिद्धांतों—संयोजकता बंध सिद्धांत (Valence Bond Theory - VBT) और आण्विक कक्षक सिद्धांत (Molecular Orbital Theory - MOT) का गहन अध्ययन करेंगे। हम संकरण (Hybridization) की क्रियाविधि को समझेंगे और MOT के आधार पर समांगी द्विपरमाणुक अणुओं के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, बन्धक्रम और उनके चुंबकीय व्यवहार की भी गणना करेंगे।

1. संयोजकता बंध सिद्धांत (Valence Bond Theory - VBT)

संयोजकता बंध सिद्धांत सर्वप्रथम 1927 में हेटलर (Heitler) और लंदन (London) द्वारा प्रस्तुत किया गया और बाद में इसे पॉलिंग (Pauling) तथा स्लेटर (Slater) द्वारा विकसित किया गया,।

मुख्य बिंदु (Main Postulates):

  • सहसंयोजक बंध (Covalent bond) का निर्माण दो परमाणुओं के अर्ध-पूरित परमाण्विक कक्षकों (Half-filled atomic orbitals) के अतिव्यापन (Overlapping) से होता है।
  • अतिव्यापन करने वाले कक्षकों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों का चक्रण (Spin) एक-दूसरे के विपरीत (Opposite) होना चाहिए।
  • अतिव्यापन की सीमा (Extent of overlapping) जितनी अधिक होगी, बनने वाला रासायनिक बंध उतना ही मजबूत होगा,।
  • अक्षीय अतिव्यापन (Axial overlap) से सिग्मा ( \( \sigma \) ) बंध बनता है, जो पार्श्व अतिव्यापन (Sidewise overlap) से बनने वाले पाई ( \( \pi \) ) बंध की तुलना में अधिक मजबूत होता है,,।

2. संकरण (Hybridization) की क्रियाविधि

VBT मीथेन (\( CH_4 \)) जैसे अणुओं की ज्यामिति और चारों बंधों की समान ऊर्जा की व्याख्या करने में विफल रहा, क्योंकि कार्बन के पास केवल दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसे समझाने के लिए संकरण (Hybridization) की अवधारणा प्रस्तुत की गई。

परिभाषा: किसी परमाणु के लगभग समान ऊर्जा वाले कक्षकों का आपस में मिलकर ऊर्जा का पुनर्वितरण (Redistribution) करना और समान ऊर्जा एवं समान आकार वाले उतने ही नए कक्षकों का निर्माण करना संकरण कहलाता है。

विभिन्न प्रकार के संकरण (Types of Hybridization)

संकरण का प्रकार मिलने वाले कक्षक नए संकरित कक्षक बंध कोण (Bond Angle) ज्यामिति (Geometry) उदाहरण
\( sp \) 1s + 1p 2 \( sp \) कक्षक 180° रेखीय (Linear) \( BeCl_2, C_2H_2 \)
\( sp^2 \) 1s + 2p 3 \( sp^2 \) कक्षक 120° त्रिकोणीय समतलीय (Trigonal Planar) \( BF_3, C_2H_4 \),
\( sp^3 \) 1s + 3p 4 \( sp^3 \) कक्षक 109.5° चतुष्फलकीय (Tetrahedral) \( CH_4, NH_3, H_2O \)
\( sp^3d \) 1s + 3p + 1d 5 \( sp^3d \) कक्षक 120° और 90° त्रिकोणीय द्विपिरामिडीय (Trigonal Bipyramidal) \( PCl_5 \)
\( sp^3d^2 \) 1s + 3p + 2d 6 \( sp^3d^2 \) कक्षक 90° अष्टफलकीय (Octahedral) \( SF_6 \)

3. आण्विक कक्षक सिद्धांत (Molecular Orbital Theory - MOT)

हुंड (Hund) और मुलिकन (Mulliken) द्वारा 1932 में प्रस्तुत यह सिद्धांत VBT की कमियों (जैसे \( O_2 \) की अनुचुंबकीय प्रकृति को न समझा पाना) को दूर करता है।

मुख्य सिद्धांत (Core Principles):

  1. जब दो परमाणु आपस में जुड़ते हैं, तो उनके परमाण्विक कक्षक (Atomic orbitals) अपनी पहचान खो देते हैं और आपस में मिलकर नए आण्विक कक्षक (Molecular Orbitals) बनाते हैं।
  2. LCAO (Linear Combination of Atomic Orbitals) विधि के अनुसार, यदि दो कक्षक जुड़ते हैं, तो दो आण्विक कक्षक बनते हैं: एक की ऊर्जा कम होती है जिसे आबंधन आण्विक कक्षक (Bonding MO - BMO) कहते हैं, और दूसरे की ऊर्जा अधिक होती है जिसे प्रति-आबंधन आण्विक कक्षक (Antibonding MO - ABMO) कहते हैं,।
  3. BMO को \( \sigma, \pi, \delta \) से और ABMO को \( \sigma^*, \pi^*, \delta^* \) से दर्शाया जाता है।

बन्धक्रम (Bond Order) एवं बन्ध लम्बाई (Bond Length)

बन्धक्रम (BO) यह दर्शाता है कि दो परमाणुओं के बीच कितने सहसंयोजक बंध हैं।

$$ \text{Bond Order (B.O.)} = \frac{1}{2} (N_b - N_a) $$

जहाँ \( N_b \) = BMO में इलेक्ट्रॉनों की संख्या और \( N_a \) = ABMO में इलेक्ट्रॉनों की संख्या。

महत्वपूर्ण संबंध: बन्धक्रम (BO) जितना अधिक होगा, बंध वियोजन ऊर्जा (Bond dissociation energy) उतनी ही अधिक होगी और बन्ध लम्बाई (Bond length) उतनी ही कम होगी

चुंबकीय व्यवहार (Magnetic Behaviour)

  • अनुचुंबकीय (Paramagnetic): यदि आण्विक कक्षकों में एक या एक से अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन (Unpaired electrons) उपस्थित हों।
  • प्रतिचुंबकीय (Diamagnetic): यदि आण्विक कक्षकों में सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित (Paired) हों।

4. समांगी द्विपरमाणुक अणुओं का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (MOT के आधार पर)

आण्विक कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का भराव ऑफबाऊ सिद्धांत (Aufbau principle), पाउली के अपवर्जन नियम और हुंड के नियम के अनुसार ऊर्जा के बढ़ते क्रम में होता है,।

(A) नाइट्रोजन अणु (\( N_2 \)) - 14 इलेक्ट्रॉन

हल्के अणुओं (14 या उससे कम इलेक्ट्रॉनों) में 2s और 2p कक्षकों के बीच मिक्सिंग के कारण \( \sigma(2p_z) \) की ऊर्जा \( \pi(2p_x) \) और \( \pi(2p_y) \) से अधिक हो जाती है。

विन्यास: \( \sigma(1s)^2 \sigma^*(1s)^2 \sigma(2s)^2 \sigma^*(2s)^2 [\pi(2p_x)^2 = \pi(2p_y)^2] \sigma(2p_z)^2 \)

  • यहाँ \( N_b = 10 \) और \( N_a = 4 \)।
  • बन्धक्रम (B.O.): \( \frac{1}{2} (10 - 4) = 3 \) (त्रिक बंध)।
  • चुंबकीय प्रकृति: सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित हैं, अतः यह प्रतिचुंबकीय (Diamagnetic) है।

(B) कार्बन अणु (\( C_2 \)) - 12 इलेक्ट्रॉन

विन्यास: \( \sigma(1s)^2 \sigma^*(1s)^2 \sigma(2s)^2 \sigma^*(2s)^2 [\pi(2p_x)^2 = \pi(2p_y)^2] \)

  • यहाँ \( N_b = 8 \) और \( N_a = 4 \)।
  • बन्धक्रम (B.O.): \( \frac{1}{2} (8 - 4) = 2 \)।
  • चुंबकीय प्रकृति: सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित हैं, अतः यह प्रतिचुंबकीय (Diamagnetic) है।
  • विशेष तथ्य: \( C_2 \) अणु में दोनों बंध \( \pi \) (पाई) बंध होते हैं क्योंकि अंतिम चार इलेक्ट्रॉन केवल \( \pi \) कक्षकों में भरे जाते हैं।

(C) ऑक्सीजन अणु (\( O_2 \)) - 16 इलेक्ट्रॉन

14 से अधिक इलेक्ट्रॉनों वाले अणुओं में \( \sigma(2p_z) \) की ऊर्जा \( \pi(2p_x) \) और \( \pi(2p_y) \) से कम होती है。

विन्यास: \( \sigma(1s)^2 \sigma^*(1s)^2 \sigma(2s)^2 \sigma^*(2s)^2 \sigma(2p_z)^2 [\pi(2p_x)^2 = \pi(2p_y)^2] [\pi^*(2p_x)^1 = \pi^*(2p_y)^1] \)।

  • यहाँ \( N_b = 10 \) और \( N_a = 6 \)।
  • बन्धक्रम (B.O.): \( \frac{1}{2} (10 - 6) = 2 \) (द्विबंध)।
  • चुंबकीय प्रकृति: \( \pi^* \) कक्षकों में 2 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं, अतः यह अनुचुंबकीय (Paramagnetic) है। VBT इसे समझाने में विफल रहा था।

(D) ऑक्सीजन धनायन (\( O_2^+ \)) - 15 इलेक्ट्रॉन

एक इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा वाले \( \pi^* \) ABMO से बाहर निकलता है।

विन्यास: \( \dots \sigma(2p_z)^2 [\pi(2p_x)^2 = \pi(2p_y)^2] [\pi^*(2p_x)^1 = \pi^*(2p_y)^0] \)

  • यहाँ \( N_b = 10 \) और \( N_a = 5 \)।
  • बन्धक्रम (B.O.): \( \frac{1}{2} (10 - 5) = 2.5 \)।
  • चुंबकीय प्रकृति: 1 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन के कारण अनुचुंबकीय (Paramagnetic)। चूँकि BO 2.5 है, अतः \( O_2^+ \) का बंध \( O_2 \) से अधिक मजबूत और छोटा होता है।

5. उच्च-स्तरीय आंकिक और वैचारिक प्रश्न (Solved Numericals)

प्रश्न 1: \( O_2, O_2^+, O_2^- \) और \( O_2^{2-} \) को उनके बन्ध लम्बाई (Bond Length) के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए और प्रत्येक का चुंबकीय गुण बताइए।

विस्तृत हल:

हम जानते हैं कि बन्ध लम्बाई \( \propto \frac{1}{\text{Bond Order}} \)। सबसे पहले सबका बन्धक्रम (BO) निकालें:

  • \( O_2 \) (16 \( e^- \)): \( BO = \frac{1}{2}(10 - 6) = 2 \) (2 अयुग्मित \( e^- \), अनुचुंबकीय)।
  • \( O_2^+ \) (15 \( e^- \)): \( BO = \frac{1}{2}(10 - 5) = 2.5 \) (1 अयुग्मित \( e^- \), अनुचुंबकीय)।
  • \( O_2^- \) (17 \( e^- \)) (Superoxide ion): \( BO = \frac{1}{2}(10 - 7) = 1.5 \) (1 अयुग्मित \( e^- \), अनुचुंबकीय)।
  • \( O_2^{2-} \) (18 \( e^- \)) (Peroxide ion): \( BO = \frac{1}{2}(10 - 8) = 1.0 \) (0 अयुग्मित \( e^- \), प्रतिचुंबकीय)।

बन्धक्रम का क्रम: \( O_2^+ (2.5) > O_2 (2.0) > O_2^- (1.5) > O_2^{2-} (1.0) \)

उत्तर: बन्ध लम्बाई का बढ़ता क्रम होगा: \( O_2^+ < O_2 < O_2^- < O_2^{2-} \)। केवल \( O_2^{2-} \) प्रतिचुंबकीय है, शेष सभी अनुचुंबकीय हैं।

प्रश्न 2: MOT के आधार पर स्पष्ट करें कि \( N_2 \) अणु की बंध वियोजन ऊर्जा (Bond Dissociation Energy) \( N_2^+ \) आयन से अधिक क्यों होती है?

विस्तृत हल:

\( N_2 \) (14 \( e^- \)) का बन्धक्रम 3 है (\( N_b = 10, N_a = 4 \))。

\( N_2^+ \) (13 \( e^- \)) बनाने के लिए इलेक्ट्रॉन आबंधन कक्षक (Bonding MO, \( \sigma(2p_z) \)) से निकाला जाता है।

अतः \( N_2^+ \) के लिए \( N_b = 9 \) और \( N_a = 4 \) होगा।

$$ \text{B.O. of } N_2^+ = \frac{1}{2}(9 - 4) = 2.5 $$
उत्तर: \( N_2 \) का बन्धक्रम (3.0), \( N_2^+ \) (2.5) से अधिक है। बन्धक्रम सीधे बंध वियोजन ऊर्जा के समानुपाती होता है। इसलिए \( N_2 \) का बंध अधिक मजबूत है और इसे तोड़ने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 3: \( CH_4, NH_3 \) और \( H_2O \) तीनों में केंद्रीय परमाणु \( sp^3 \) संकरित हैं, फिर भी उनके बंध कोण क्रमशः 109.5°, 107° और 104.5° क्यों होते हैं?

विस्तृत हल:

यह VSEPR (Valence Shell Electron Pair Repulsion) सिद्धांत द्वारा समझाया जा सकता है:

  • \( CH_4 \) में कार्बन के पास 4 बंध युग्म (Bond Pairs) और 0 एकाकी युग्म (Lone Pair) हैं। अतः यह आदर्श चतुष्फलकीय ज्यामिति बनाता है और कोण 109.5° होता है।
  • \( NH_3 \) में नाइट्रोजन के पास 3 बंध युग्म और 1 एकाकी युग्म (Lone Pair) है। VSEPR के अनुसार, (Lone Pair - Bond Pair) प्रतिकर्षण > (Bond Pair - Bond Pair) प्रतिकर्षण। यह बंधों को अंदर की ओर धकेलता है जिससे कोण घटकर 107° रह जाता है।
  • \( H_2O \) में ऑक्सीजन के पास 2 बंध युग्म और 2 एकाकी युग्म (Lone Pairs) हैं। यहाँ (Lone Pair - Lone Pair) प्रतिकर्षण सबसे अधिक होता है, जो बंध कोण को और अधिक संकुचित करके 104.5° कर देता है।
उत्तर: एकाकी युग्मों (Lone pairs) की संख्या बढ़ने से इलेक्ट्रॉनों के बीच प्रतिकर्षण (Repulsion) बढ़ता है, जिससे बंध कोण 109.5° से संकुचित होकर कम हो जाता है।

प्रश्न 4: हीलियम अणु (\( He_2 \)) प्रकृति में अस्तित्व में क्यों नहीं है? आण्विक कक्षक सिद्धांत (MOT) द्वारा सिद्ध करें।

विस्तृत हल:

हीलियम (He) का परमाणु क्रमांक 2 है, अतः इसके पास 2 इलेक्ट्रॉन (\( 1s^2 \)) हैं।

दो हीलियम परमाणुओं के मिलने पर \( He_2 \) के लिए कुल इलेक्ट्रॉनों की संख्या 4 होगी。

MOT विन्यास: \( \sigma(1s)^2 \sigma^*(1s)^2 \)

यहाँ आबंधन इलेक्ट्रॉनों की संख्या (\( N_b \)) = 2 और प्रति-आबंधन इलेक्ट्रॉनों की संख्या (\( N_a \)) = 2।

$$ \text{B.O.} = \frac{1}{2}(N_b - N_a) = \frac{1}{2}(2 - 2) = 0 $$
उत्तर: चूँकि बन्धक्रम शून्य (0) है, इसका अर्थ है कि दोनों परमाणुओं के बीच कोई रासायनिक बंध नहीं बन सकता। प्रति-आबंधन कक्षक (ABMO) का प्रभाव आबंधन कक्षक (BMO) के प्रभाव को पूरी तरह से निरस्त कर देता है, अतः \( He_2 \) अणु का कोई अस्तित्व नहीं है

प्रश्न 5: \( CO \) अणु का आण्विक कक्षक विन्यास लिखें और उसका बन्धक्रम एवं चुंबकीय प्रकृति ज्ञात करें।

विस्तृत हल:

कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) एक विषम-नाभिकीय (Heteronuclear) द्विपरमाणुक अणु है।

कुल संयोजी इलेक्ट्रॉन = कार्बन के 4 + ऑक्सीजन के 6 = 10 इलेक्ट्रॉन।

ऑक्सीजन की वैद्युतऋणात्मकता कार्बन से अधिक होने के कारण, O के 2s और 2p कक्षकों की ऊर्जा C के कक्षकों से कम होती है।

MOT विन्यास: \( \dots \sigma(2s)^2 \sigma^*(2s)^2 \sigma(2p_z)^2 \pi(2p_x)^2 = \pi(2p_y)^2 \) (यहाँ \( \sigma^*(2s) \) को प्रायः गैर-आबंधी या \( \sigma_{nb} \) माना जाता है)। कुल मिलाकर 8 आबंधन इलेक्ट्रॉन और 2 प्रति-आबंधन इलेक्ट्रॉन संयोजी कोश में भाग लेते हैं (या यदि पूर्ण रूप से देखें, तो \( N_b = 10, N_a = 4 \))。

$$ \text{B.O.} = \frac{1}{2} (10 - 4) = 3 $$
उत्तर: \( CO \) अणु का बन्धक्रम 3 है। चूँकि इसके सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित हैं, अतः यह एक प्रतिचुंबकीय (Diamagnetic) अणु है।