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Circulatory System | Human Heart (मानव हृदय) की संरचना और कार्यविधि

July 18, 2026 |

मानव शरीरिकी (Human Anatomy) और जीव विज्ञान (Biology) में परिसंचरण तंत्र (Circulatory System) का मुख्य अंग हृदय (Heart) है। यह एक अत्यंत विशिष्ट पेशीय अंग (Muscular organ) है जो एक पंप की तरह कार्य करता है और जीवन भर बिना थके पूरे शरीर में रक्त (Blood) का संचार करता है। भ्रूणीय विकास के दौरान हृदय की उत्पत्ति मध्यजनस्तर (Mesoderm) से होती है। यह वक्ष गुहा (Thoracic cavity) में दोनों फेफड़ों (Lungs) के मध्य स्थित होता है और इसका बायां भाग थोड़ा सा बाईं ओर झुका होता है। इसका आकार एक बंद मुट्ठी (Clenched fist) के समान होता है।

हृदय एक दोहरी भित्ति वाली झिल्लीमयी थैली द्वारा सुरक्षित रहता है, जिसे हृदयावरण (Pericardium) कहा जाता है। इस आवरण के भीतर पेरीकार्डियल द्रव (Pericardial fluid) भरा होता है, जो हृदय को बाहरी आघातों (Mechanical shocks) से बचाता है और धड़कते समय घर्षण (Friction) को कम करता है।


1. मानव हृदय की आंतरिक संरचना (Internal Anatomy of Human Heart)

मानव हृदय में चार कक्ष (Four chambers) होते हैं। ऊपरी दो कक्ष अपेक्षाकृत छोटे होते हैं जिन्हें अलिंद (Atria / Auricles) कहते हैं, और निचले दो कक्ष बड़े और मोटी भित्ति वाले होते हैं जिन्हें निलय (Ventricles) कहते हैं।

  • अलिंद (Atria): दायां और बायां अलिंद एक पतली पेशीय भित्ति द्वारा एक-दूसरे से अलग रहते हैं, जिसे अंतरा-अलिंद पट (Inter-atrial septum) कहते हैं। ये रक्त को ग्रहण करने वाले (Receiving chambers) कक्ष हैं।
  • निलय (Ventricles): दायां और बायां निलय एक मोटी भित्ति द्वारा अलग रहते हैं, जिसे अंतरा-निलय पट (Inter-ventricular septum) कहते हैं। निलय की भित्ति अलिंदों की तुलना में बहुत अधिक मोटी होती है क्योंकि इन्हें रक्त को पूरे शरीर में अत्यधिक दाब के साथ पंप करना होता है (विशेषकर बाएँ निलय को)।
  • अलिंद-निलय पट (Atrio-ventricular septum): एक ही ओर के अलिंद और निलय भी एक मोटे रेशेदार ऊतक द्वारा अलग रहते हैं।

हृदय के कपाट (Valves of the Heart)

कपाट यह सुनिश्चित करते हैं कि रक्त का प्रवाह केवल एक ही दिशा (अलिंद से निलय, और निलय से महाधमनी/फुफ्फुसीय धमनी) में हो। ये रक्त के विपरीत प्रवाह (Backflow) को रोकते हैं:

  • त्रिवलनी कपाट (Tricuspid Valve): यह कपाट दाएँ अलिंद (Right atrium) और दाएँ निलय (Right ventricle) के बीच स्थित होता है। इसमें तीन पेशीय वलन (Flaps/Cusps) होते हैं।
  • द्विवलनी या मिट्रल कपाट (Bicuspid or Mitral Valve): यह बाएँ अलिंद (Left atrium) और बाएँ निलय (Left ventricle) के बीच पाया जाता है। इसमें दो वलन होते हैं।
  • अर्धचंद्राकार कपाट (Semilunar Valves): ये कपाट दाएँ निलय से निकलने वाली फुफ्फुसीय धमनी (Pulmonary artery) और बाएँ निलय से निकलने वाली महाधमनी (Aorta) के उद्गम स्थल पर पाए जाते हैं।
  • कॉर्डा टेंडिनी (Chordae tendineae): ये विशेष रेशेदार रज्जुक (Cords) होते हैं जो अलिंद-निलय कपाटों को निलय की भित्ति की पैपिलरी पेशियों (Papillary muscles) से जोड़ते हैं। ये कपाटों को उल्टी दिशा में पलटने से रोकते हैं।
Detailed internal structure of the human heart showing all 4 chambers, valves, septum, and major blood vessels
चित्र: मानव हृदय की आंतरिक संरचना एवं रक्त वाहिकाएं (Internal Anatomy of Human Heart)

2. हृदय का चालन तंत्र (Conducting System of the Heart)

संपूर्ण हृदय हृदय-पेशियों (Cardiac muscles) का बना होता है। मानव हृदय मायोजेनिक (Myogenic) होता है, अर्थात इसके संकुचन की प्रेरणा तंत्रिका तंत्र (Nervous system) से नहीं, बल्कि स्वयं हृदय की विशेष पेशियों द्वारा उत्पन्न होती है। इस स्व-उत्तेजक (Auto-excitable) तंत्र के मुख्य भाग निम्नलिखित हैं:

  • शिरा-अलिंद पर्व (Sino-atrial node - SAN): यह दाएँ अलिंद की दाहिनी ऊपरी भित्ति पर स्थित होता है। यह बिना किसी बाहरी उत्तेजना के स्वतः ही क्रिया विभव (Action potential) उत्पन्न कर सकता है। चूँकि यह हृदय की धड़कन (Heartbeat) को शुरू करता है और उसकी लय (Rhythm) बनाए रखता है, इसलिए इसे हृदय का पेसमेकर (Pacemaker) कहा जाता है।
  • अलिंद-निलय पर्व (Atrio-ventricular node - AVN): यह दाएँ अलिंद के निचले बाएँ कोने पर, अलिंद-निलय पट के पास स्थित होता है।
  • हिस का बंडल (Bundle of His) और पुरकिंजे तंतु (Purkinje fibres): AVN से पेशीय तंतुओं का एक बंडल (AV Bundle) निकलता है जो अंतरा-निलय पट से होकर गुजरता है और दाएँ तथा बाएँ बंडलों में विभाजित हो जाता है। इनसे सूक्ष्म तंतु निकलते हैं जो निलय की पूरी भित्ति में फैल जाते हैं, जिन्हें पुरकिंजे तंतु कहते हैं।

3. कार्यप्रणाली: हृदय चक्र (Mechanism of Cardiac Cycle)

हृदय की एक धड़कन के आरंभ से लेकर अगली धड़कन के आरंभ तक के घटनाक्रम को हृदय चक्र (Cardiac Cycle) कहा जाता है। एक सामान्य स्वस्थ मनुष्य में एक मिनट में 72 बार हृदय धड़कता है, इसलिए एक हृदय चक्र की अवधि लगभग 0.8 सेकंड होती है। यह निम्नलिखित क्रमिक चरणों में संपन्न होता है:

  1. संयुक्त अनुशिथिलन (Joint Diastole - 0.4 sec): प्रारंभ में सभी चार कक्ष शिथिल (Relaxed) अवस्था में होते हैं। त्रिवलनी और द्विवलनी कपाट खुले रहते हैं। फुफ्फुसीय शिराओं (Pulmonary veins) और महाशिरा (Vena cava) से रक्त क्रमशः बाएँ और दाएँ अलिंदों से होते हुए सीधे बाएँ और दाएँ निलयों में भरता रहता है। इस समय अर्धचंद्राकार कपाट बंद होते हैं।
  2. अलिंद प्रकुंचन (Atrial Systole - 0.1 sec): SAN एक क्रिया विभव उत्पन्न करता है जो दोनों अलिंदों को एक साथ संकुचित (Contract) करता है। इससे निलयों में रक्त का प्रवाह लगभग 30% बढ़ जाता है।
  3. निलय प्रकुंचन (Ventricular Systole - 0.3 sec): क्रिया विभव AVN और बंडल ऑफ हिस के माध्यम से निलयों तक पहुँचता है, जिससे निलय संकुचित होते हैं।
    • निलयों में दाब बढ़ने के कारण त्रिवलनी और द्विवलनी कपाट बलपूर्वक बंद हो जाते हैं, जिससे पहली हृदय ध्वनि 'लब' (Lub) उत्पन्न होती है।
    • दाब और अधिक बढ़ने पर अर्धचंद्राकार कपाट (Semilunar valves) खुल जाते हैं और रक्त फुफ्फुसीय धमनी तथा महाधमनी में पंप हो जाता है।
  4. निलय अनुशिथिलन (Ventricular Diastole): अब निलय शिथिल होते हैं और उनका दाब कम होता है। धमनियों का रक्त वापस निलयों में न आ जाए, इसके लिए अर्धचंद्राकार कपाट बंद हो जाते हैं, जिससे दूसरी हृदय ध्वनि 'डब' (Dub) उत्पन्न होती है। पुनः संयुक्त अनुशिथिलन की अवस्था आ जाती है।
Flowchart showing the stages of Cardiac Cycle and flow of blood
चित्र: हृदय चक्र के विभिन्न चरण और रक्त का दिशात्मक प्रवाह (Stages of Cardiac Cycle)

4. दोहरा परिसंचरण (Double Circulation)

मनुष्यों (तथा सभी पक्षियों और स्तनधारियों) में रक्त एक पूर्ण चक्र में हृदय से होकर दो बार गुजरता है। इसे दोहरा परिसंचरण (Double Circulation) कहते हैं। इसके दो मुख्य पथ होते हैं:

  • फुफ्फुसीय परिसंचरण (Pulmonary Circulation): दाएँ निलय से विऑक्सीजनित (Deoxygenated) रक्त फुफ्फुसीय धमनी (Pulmonary artery) द्वारा फेफड़ों (Lungs) में ले जाया जाता है। फेफड़ों में शुद्ध (ऑक्सीजनित) होने के बाद यह रक्त फुफ्फुसीय शिराओं (Pulmonary veins) द्वारा बाएँ अलिंद (Left atrium) में वापस आता है। (नोट: फुफ्फुसीय धमनी शरीर की एकमात्र धमनी है जो अशुद्ध रक्त ले जाती है, और फुफ्फुसीय शिरा एकमात्र शिरा है जो शुद्ध रक्त ले जाती है)।
  • दैहिक परिसंचरण (Systemic Circulation): बाएँ निलय से ऑक्सीजनित (Oxygenated) रक्त महाधमनी (Aorta) और उसकी शाखाओं द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों/ऊतकों तक पंप किया जाता है। ऊतकों में गैसीय विनिमय के बाद, विऑक्सीजनित रक्त महाशिराओं (Vena cavae) द्वारा एकत्रित होकर दाएँ अलिंद में लाया जाता है।

महत्व (Significance): दोहरा परिसंचरण ऑक्सीजनित और विऑक्सीजनित रक्त को आपस में मिलने से रोकता है, जो समतापी (Warm-blooded) जंतुओं की उच्च ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।


5. हृदय की कार्यक्षमता संबंधी सूत्र एवं गणना (Physiological Formulas & Calculations)

हृदय की कार्यक्षमता (Efficiency) को हृदय निकास (Cardiac Output) द्वारा मापा जाता है।

  • स्ट्रोक आयतन (Stroke Volume - SV): प्रत्येक हृदय चक्र के दौरान प्रत्येक निलय द्वारा पंप किए गए रक्त की मात्रा स्ट्रोक आयतन कहलाती है। एक स्वस्थ वयस्क में यह लगभग 70 mL होती है।
  • हृदय दर (Heart Rate - HR): एक मिनट में हृदय के धड़कने की कुल संख्या (सामान्यतः 72 beats/minute)।

हृदय निकास (Cardiac Output - CO) का सूत्र:

$$ CO = SV \times HR $$

मान रखने पर (Calculation):

$$ CO = 70 \text{ mL/beat} \times 72 \text{ beats/min} $$ $$ CO \approx 5040 \text{ mL/min} \approx 5 \text{ Litres/min} $$

अर्थात, एक स्वस्थ मनुष्य का हृदय प्रति मिनट लगभग 5 लीटर रक्त पंप करता है। एथलीटों (Athletes) का कार्डियक आउटपुट सामान्य मनुष्यों की तुलना में बहुत अधिक होता है।


6. परीक्षा केंद्रित महत्वपूर्ण तथ्य एवं रोग (Key Exam Takeaways & Diseases)

हृदय ध्वनियाँ (Heart Sounds):
स्टेथोस्कोप (Stethoscope) से सुनने पर प्रत्येक हृदय चक्र में दो प्रमुख ध्वनियाँ सुनाई देती हैं:
  1. Lub (लब): यह प्रथम ध्वनि है जो निलय प्रकुंचन की शुरुआत में त्रिवलनी और द्विवलनी कपाटों के बंद होने के कारण उत्पन्न होती है। यह धीमी और लंबी होती है।
  2. Dub (डब): यह द्वितीय ध्वनि है जो निलय अनुशिथिलन की शुरुआत में अर्धचंद्राकार कपाटों के बंद होने के कारण उत्पन्न होती है। यह तेज़ और छोटी होती है।
यदि इन कपाटों में कोई विकार आ जाए, तो एक असामान्य ध्वनि उत्पन्न होती है जिसे हृदय मर्मर (Heart Murmur) कहते हैं।
हृदय संबंधी महत्वपूर्ण विकार (Disorders of Circulatory System):

1. हृदय शूल (Angina Pectoris): जब हृदय की पेशियों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है, तो सीने में तेज़ दर्द (Acute chest pain) होता है, जिसे एंजाइना कहते हैं। यह रक्त प्रवाह के प्रभावित होने के कारण होता है।

2. हृदय रोधगलन / हार्ट अटैक (Myocardial Infarction): कोरोनरी धमनी (Coronary artery - जो हृदय की पेशियों को रक्त देती है) में थक्का (Clot) बनने या रुकावट के कारण हृदय की पेशियों को रक्त मिलना बंद हो जाता है और वे मृत होने लगती हैं। इसे आम भाषा में हार्ट अटैक कहते हैं।

3. हृदय का रुकना (Heart Failure): यह वह अवस्था है जब हृदय शरीर की आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त रक्त पंप करने में सक्षम नहीं रह जाता। इसका सबसे प्रमुख लक्षण फेफड़ों में संकुलन (Congestion in lungs) होना है।