Loading...

Kingdom Animalia | जन्तु जगत

July 18, 2026 |

जीव विज्ञान (Biology) में आर. एच. व्हिटेकर (R.H. Whittaker) द्वारा 1969 में प्रस्तावित पाँच जगत वर्गीकरण (Five Kingdom Classification) में जन्तु जगत (Kingdom Animalia) सबसे विशाल और जटिल जगत है। इस जगत में उन सभी जीवों को सम्मिलित किया गया है जो बहुकोशिकीय (Multicellular), यूकेरियोटिक (Eukaryotic) और विषमपोषी (Heterotrophic) होते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जन्तु कोशिकाओं में कोशिका भित्ति (Cell wall) का पूर्णतः अभाव होता है। प्राणी अपने भोजन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पौधों पर निर्भर करते हैं और वे भोजन को एक आंतरिक गुहा में पचाते हैं। इनमें संवेदी (Sensory) और तंत्रिका प्रेरक (Neuromotor) तंत्र अत्यधिक विकसित होते हैं।

जीवों के वर्गीकरण की प्रणाली में जन्तु जगत के विभेदक लक्षण (Differential Characteristics)

अन्य जगतों (मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक और पादप) की तुलना में जन्तु जगत के अद्वितीय विभेदक लक्षण निम्नलिखित हैं:

लक्षण (Characteristics) जन्तु जगत (Kingdom Animalia) में स्थिति
कोशिका प्रकार (Cell Type) यूकेरियोटिक (Eukaryotic) - सुसंगठित केंद्रक (True nucleus) उपस्थित।
कोशिका भित्ति (Cell Wall) पूर्णतः अनुपस्थित (Absent)। (यही इन्हें पादपों और कवकों से अलग करता है)।
शारीरिक संगठन (Body Organisation) बहुकोशिकीय; ऊतक (Tissue), अंग (Organ) और अंग-तंत्र (Organ-system) स्तर का जटिल संगठन।
पोषण की विधि (Mode of Nutrition) प्राणिसमपोषी या प्राणीसमभोजी (Holozoic) अर्थात भोजन का अंतर्ग्रहण (Ingestion) करके आंतरिक गुहा में पचाना।
संचित भोजन (Reserve Food) अतिरिक्त भोजन मुख्य रूप से ग्लाइकोजन (Glycogen) और वसा (Fat) के रूप में संचित होता है।
चलन (Locomotion) अधिकांश जंतु चलन (Motile) में सक्षम होते हैं।
Detailed diagram of a typical Animal Cell showing Plasma Membrane, Nucleus, and absence of Cell Wall
चित्र: जन्तु कोशिका (Animal Cell) की आंतरिक संरचना जिसमें कोशिका भित्ति अनुपस्थित है

1. जन्तुओं के वर्गीकरण का मूलभूत आधार (Basis of Animal Classification)

यद्यपि जन्तु जगत में जीवों की संरचना और आकार में व्यापक भिन्नता है, फिर भी कुछ मूलभूत शारीरिक विशेषताएँ (Fundamental features) वर्गीकरण का आधार बनती हैं:

  • संगठन का स्तर (Levels of Organisation):
    • कोशिकीय स्तर (Cellular Level): कोशिकाएं बिखरे हुए समूहों में होती हैं, ऊतक नहीं बनते। (उदाहरण: पोरीफेरा/स्पंज)।
    • ऊतक स्तर (Tissue Level): समान कार्य करने वाली कोशिकाएं ऊतक बनाती हैं। (उदाहरण: सीलेन्ट्रेटा, टीनोफोरा)।
    • अंग एवं अंग-तंत्र स्तर (Organ & Organ-system Level): ऊतक मिलकर अंग और अंग-तंत्र बनाते हैं। (उदाहरण: प्लैटीहेल्मिन्थीज से कॉर्डेटा तक)।
  • सममिति (Symmetry):
    • असममित (Asymmetrical): कोई भी तल शरीर को दो समान भागों में नहीं बांटता। (उदाहरण: स्पंज)।
    • अरीय सममिति (Radial Symmetry): केंद्रीय अक्ष से गुजरने वाला कोई भी तल शरीर को दो समरूप भागों में बांटता है। (उदाहरण: सीलेन्ट्रेटा, वयस्क एकाइनोडर्मेटा)।
    • द्विपार्श्व सममिति (Bilateral Symmetry): केवल एक ही तल शरीर को दाएं और बाएं समान भागों में बांटता है। (उदाहरण: आर्थ्रोपोडा, मानव)।
  • भ्रूणीय स्तर (Diploblastic and Triploblastic Organisation): जंतु जिनके भ्रूण में दो जनन स्तर (Ectoderm और Endoderm) होते हैं, द्विकोरिक (Diploblastic) कहलाते हैं। जिनमें तीन स्तर (Mesoderm सहित) होते हैं, वे त्रिकोरिक (Triploblastic) कहलाते हैं।
  • प्रगुहा या सीलोम (Coelom): शरीर की भित्ति और आहारनाल के बीच की गुहा जो मेसोडर्म द्वारा आस्तरित होती है, प्रगुहा कहलाती है।
    • अगुहीय (Acoelomate): प्रगुहा अनुपस्थित (उदाहरण: प्लैटीहेल्मिन्थीज)।
    • कूटगुहीय (Pseudocoelomate): प्रगुहा मेसोडर्म से आस्तरित नहीं होती, बल्कि पाउच में बिखरी होती है (उदाहरण: ऐस्केलमिन्थीज़)।
    • प्रगुहीय (Coelomate): सत्य प्रगुहा उपस्थित (उदाहरण: ऐनेलिडा से कॉर्डेटा)।

2. प्रमुख संघ और उनके विशिष्ट लक्षण (Major Phyla and their Salient Features)

A. अकशेरुकी (Non-Chordates)

इनमें पृष्ठरज्जु (Notochord) अनुपस्थित होती है।

  • पोरीफेरा (Porifera - स्पंज): इनमें जल परिवहन या नाल तंत्र (Water canal system) होता है जो भोजन ग्रहण और श्वसन में सहायक है।
  • सीलेन्ट्रेटा (Coelenterata / Cnidaria): दंश कोशिकाएं (Cnidoblasts) उपस्थित होती हैं जिनका उपयोग रक्षा और शिकार पकड़ने में होता है। पाचन अंतःकोशिकीय (Intracellular) और बाह्यकोशिकीय (Extracellular) दोनों प्रकार का होता है।
  • टीनोफोरा (Ctenophora): इनमें कंकत पट्टिकाएं (Comb plates) चलन में सहायक होती हैं।
  • प्लैटीहेल्मिन्थीज (Platyhelminthes - चपटे कृमि): ये मुख्य रूप से परजीवी (Parasites) होते हैं। परजीवी अनुकूलन (Parasitic adaptations) के रूप में इनमें अंकुश (Hooks) और चूषक (Suckers) पाए जाते हैं।
  • ऐस्केलमिन्थीज़ (Aschelminthes - गोल कृमि): शरीर अनुप्रस्थ काट में गोलाकार होता है। कूटगुहा (Pseudocoelom) पाई जाती है।
  • ऐनेलिडा (Annelida): शरीर विखंडों (Metameres) में बंटा होता है। यह विखंडी खंडीभवन (Metamerism) का स्पष्ट उदाहरण है।
  • आर्थ्रोपोडा (Arthropoda): यह जन्तु जगत का सबसे बड़ा संघ (Largest group) है। इनमें संधियुक्त उपांग (Jointed appendages) और काइटिन युक्त बाह्यकंकाल (Chitinous exoskeleton) पाया जाता है।
  • एकाइनोडर्मेटा (Echinodermata - शूलयुक्त जंतु): इनका सबसे विशिष्ट लक्षण जल संवहनी तंत्र (Water vascular system) है जो चलन, शिकार पकड़ने और श्वसन में मदद करता है।

B. संघ कॉर्डेटा (Phylum Chordata)

कॉर्डेट्स के तीन मूलभूत लक्षण हैं: (1) पृष्ठरज्जु (Notochord) की उपस्थिति, (2) पृष्ठ खोखली तंत्रिका रज्जु (Dorsal hollow nerve cord), और (3) ग्रसनीय क्लोम दरारें (Pharyngeal gill slits)। कॉर्डेटा को मुख्य रूप से कशेरुकी (Vertebrata) उपसंघ में बांटा गया है, जहाँ पृष्ठरज्जु भ्रूणीय अवस्था के बाद उपास्थिल या अस्थिल मेरुदंड (Vertebral column) में बदल जाती है।

कशेरुकी (Vertebrates) के प्रमुख वर्ग:

  • पिसीज / मछलियां (Pisces): ये असमतापी (Poikilothermous / Cold-blooded) होते हैं। इनमें प्लवन (तैरने) के लिए वायु आशय (Air bladder) उपस्थित होता है जो इन्हें डूबने से बचाता है।
  • एम्फीबिया (Amphibia - उभयचर): जल और स्थल दोनों पर जीवित रह सकते हैं।
  • रेप्टीलिया (Reptilia - सरीसृप): रेंगकर चलते हैं। इनकी त्वचा शुष्क और श्रृंगित (Dry and cornified) होती है। सांपों में पैर अनुपस्थित होते हैं। ये भी असमतापी (Poikilothermous) हैं।
  • एवीज (Aves - पक्षी): ये समतापी (Warm-blooded / Homoiothermous) जंतु हैं। उड़ने के लिए इनके अग्रपाद (Forelimbs) पंखों (Wings) में रूपांतरित हो जाते हैं। शरीर पर पर (Feathers) पाए जाते हैं।
  • मैमेलिया (Mammalia - स्तनधारी): इनका सबसे अद्वितीय लक्षण स्तन ग्रंथियों (Mammary glands) और त्वचा पर बालों (Hairs) की उपस्थिति है। निषेचन आंतरिक (Internal fertilization) होता है। ये मुख्य रूप से जरायुज या बच्चे देने वाले (Viviparous) होते हैं, हालांकि इसके कुछ अपवाद हैं।
    प्रमुख उदाहरण:
    • अंडज (Oviparous): ऑर्निथोरिंकस (प्लेटिपस - Ornithorhynchus)
    • जरायुज (Viviparous): मैक्रोपस (कंगारू - Macropus), प्टेरोपस (फ्लाइंग फॉक्स), ऊंट (Camelus), बंदर (Macaca), चूहा (Rattus), कुत्ता (Canis), बिल्ली (Felis), हाथी (Elephas), घोड़ा (Equus), डॉल्फिन (Delphinus), ब्लू व्हेल (Balaenoptera), बाघ (Panthera tigris), शेर (Panthera leo)।
Detailed diagram of characteristic features of Chordates (Notochord, Nerve Cord, Gill Slits)
चित्र: कॉर्डेटा संघ के जंतुओं के मूलभूत लक्षण (Fundamental features of Chordates)

3. कार्यप्रणाली: जन्तुओं में प्राणीसमभोजी पोषण तंत्र (Mechanism of Holozoic Nutrition)

जन्तुओं में ऊर्जा प्राप्ति और पोषण एक जटिल चरणबद्ध प्रक्रिया है जो उनकी जठरांत्र संबंधी मार्ग (Gastrointestinal tract) में संपन्न होती है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विकास (Direct vs Indirect development) वाले जीवों में पाचन तंत्र भिन्न हो सकता है, लेकिन मूलभूत प्रक्रिया समान है। कोशिकीय श्वसन के लिए जन्तु जो भोजन ग्रहण करते हैं, उसका जैव-रासायनिक ऊर्जा समीकरण इस प्रकार है:

$$ C_6H_{12}O_6 + 6O_2 \xrightarrow{\text{Enzymes}} 6CO_2 + 6H_2O + \text{ATP (Energy)} $$

पोषण के चरण (Steps of Holozoic Nutrition):

  1. अंतर्ग्रहण (Ingestion): भोजन को मुंह या विशेष अंगों (जैसे अमीबा में कूटपाद, या स्तनधारियों में मुख) द्वारा शरीर के अंदर लेना।
  2. पाचन (Digestion): जटिल और अघुलनशील कार्बनिक पदार्थों का एंजाइमों (Enzymes) की सहायता से सरल और घुलनशील अणुओं में टूटना। (निम्न जीवों में यह अंतःकोशिकीय / Intracellular होता है, जबकि उच्च जीवों में बाह्यकोशिकीय / Extracellular होता है)।
  3. अवशोषण (Absorption): पचे हुए सरल पोषक तत्वों का आंत्र भित्ति (Intestinal wall) के माध्यम से रक्त या लसीका (Lymph) में प्रवेश करना।
  4. स्वांगीकरण (Assimilation): रक्त द्वारा अवशोषित पोषक तत्वों को कोशिकाओं तक पहुंचाना, जहाँ उनका उपयोग ऊर्जा उत्पादन (ATP), वृद्धि और ऊतकों की मरम्मत के लिए किया जाता है।
  5. मलत्याग / बहिःक्षेपण (Egestion): अपचे और अवशिष्ट पदार्थों का शरीर से गुदा (Anus) या उत्सर्जन छिद्र के माध्यम से बाहर निकलना।

4. परीक्षा केंद्रित महत्वपूर्ण तथ्य और अपवाद (Key Exam Takeaways & Exceptions)

विकास (Development) में अपवाद: जन्तुओं में विकास दो प्रकार का होता है - प्रत्यक्ष (Direct), जिसमें युवा अपने माता-पिता के समान दिखते हैं (जैसे मानव), और अप्रत्यक्ष (Indirect), जिसमें एक लार्वा (Larval) अवस्था होती है जो वयस्क से संरचनात्मक रूप से अलग होती है (जैसे मेंढक का टैडपोल, या कीटों की इल्ली)।
कॉर्डेटा का सिद्धांत: "सभी कशेरुकी (Vertebrates) कॉर्डेट्स (Chordates) होते हैं, लेकिन सभी कॉर्डेट्स कशेरुकी नहीं होते।" यह कथन पूर्णतः सत्य है क्योंकि कशेरुकी जंतुओं में भ्रूणीय पृष्ठरज्जु (Notochord) वयस्क अवस्था में मेरुदंड (Vertebral column) में बदल जाती है। लेकिन यूरोकॉर्डेटा और सेफैलोकॉर्डेटा (अन्य कॉर्डेट्स) में पृष्ठरज्जु जीवन भर या पूंछ तक सीमित रहती है और मेरुदंड नहीं बनाती।
एकाइनोडर्मेटा में सममिति का बदलाव: एकाइनोडर्मेटा संघ के जन्तु विकास के दौरान सममिति (Symmetry) बदलते हैं। इनका लार्वा द्विपार्श्व सममित (Bilaterally symmetrical) होता है, जबकि वयस्क अरीय सममित (Radially symmetrical) हो जाता है। यह प्रतियोगी परीक्षाओं का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।