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Transpiration | वाष्पोत्सर्जन

July 18, 2026 |

वनस्पति विज्ञान (Botany) में पौधों द्वारा भूमि से अवशोषित जल का अधिकांश भाग उनके जैविक कार्यों में उपयोग नहीं होता है। पौधों के वायवीय भागों (Aerial parts), विशेषकर पत्तियों से, जल का वाष्प (Water vapor) के रूप में उड़ने या हास होने की शारीरिक प्रक्रिया को वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) कहा जाता है। यह एक अत्यंत आवश्यक जैविक प्रक्रिया है जो पौधों को शीतलता (Cooling effect) प्रदान करती है और जाइलम (Xylem) में रसारोहण (Ascent of sap) के लिए वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (Transpiration pull) उत्पन्न करती है। कर्टिस (Curtis, 1926) ने इसे "एक आवश्यक बुराई" (A necessary evil) कहा था।


1. वाष्पोत्सर्जन के प्रकार (Types of Transpiration)

पौधे के किस अंग से जलवाष्प का हास हो रहा है, इसके आधार पर वाष्पोत्सर्जन को मुख्य रूप से तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है:

  • रंध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Stomatal Transpiration): पत्तियों की बाह्यत्वचा (Epidermis) पर असंख्य छोटे-छोटे छिद्र पाए जाते हैं जिन्हें रंध्र (Stomata) कहते हैं। पौधे के कुल वाष्पोत्सर्जन का 80% से 90% भाग केवल इन्हीं रंध्रों के माध्यम से होता है।
  • उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन (Cuticular Transpiration): पत्तियों और शाकीय तनों की बाह्यत्वचा के ऊपर क्यूटिन (Cutin) नामक मोमी पदार्थ की एक परत होती है जिसे उपत्वचा (Cuticle) कहते हैं। यदि उपत्वचा पतली हो, तो कुछ जलवाष्प इसके माध्यम से भी उड़ जाती है। कुल वाष्पोत्सर्जन का 9% से 9.9% भाग इसके द्वारा होता है।
  • वातरंध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Lenticular Transpiration): काष्ठीय तनों (Woody stems) और कुछ फलों की छाल (Bark) पर छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिन्हें वातरंध्र (Lenticels) कहते हैं। इनके द्वारा कुल वाष्पोत्सर्जन का केवल 0.1% से 1% भाग ही संपन्न होता है।

2. रंध्र की संरचना और शारीरिकी (Anatomy of Stomata)

चूँकि अधिकांश वाष्पोत्सर्जन रंध्रों द्वारा होता है, अतः रंध्रों की संरचना को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक रंध्र (Stoma) एक सूक्ष्म छिद्र होता है जो दो विशिष्ट बाह्यत्वचीय कोशिकाओं (Epidermal cells) से घिरा रहता है।

  • द्वार कोशिकाएं (Guard Cells): द्विबीजपत्री पौधों (Dicots) में ये सेम के बीज या वृक्क के आकार (Kidney/Bean-shaped) की होती हैं, जबकि एकबीजपत्री पौधों (Monocots, जैसे घास) में ये डंबलाकार (Dumb-bell shaped) होती हैं।
    • द्वार कोशिकाओं की आंतरिक भित्ति (Inner wall) जो छिद्र की ओर होती है, वह मोटी और अप्रत्यास्थ (Thick and inelastic) होती है।
    • द्वार कोशिकाओं की बाहरी भित्ति (Outer wall) पतली और प्रत्यास्थ (Thin and elastic) होती है।
    • इन कोशिकाओं में हरितलवक (Chloroplasts) उपस्थित होते हैं, जो अन्य बाह्यत्वचीय कोशिकाओं में नहीं पाए जाते।
  • सहायक कोशिकाएं (Subsidiary/Accessory Cells): द्वार कोशिकाओं को घेरने वाली विशिष्ट आकार की बाह्यत्वचीय कोशिकाओं को सहायक कोशिकाएं कहते हैं।
Detailed diagram of Dicot and Monocot Stomata showing Guard cells, Subsidiary cells, and Chloroplasts
चित्र: खुले और बंद रंध्र की सूक्ष्मदर्शीय संरचना (Structure of Open and Closed Stomata)

3. रंध्रों के खुलने और बंद होने की क्रियाविधि (Mechanism of Stomatal Movement)

रंध्रों का खुलना और बंद होना द्वार कोशिकाओं की स्फीति (Turgidity) और शिथिलता (Flaccidity) पर निर्भर करता है। जब द्वार कोशिकाएं जल अवशोषित कर स्फीत (Turgid) हो जाती हैं, तो उनकी पतली बाहरी भित्ति बाहर की ओर खिंचती है, जिससे मोटी आंतरिक भित्ति भी अर्द्धचंद्राकार हो जाती है और रंध्र खुल जाते हैं। इसके विपरीत, बहिःपरासरण (Exosmosis) के कारण द्वार कोशिकाओं के शिथिल (Flaccid) होने पर रंध्र बंद हो जाते हैं।

इस प्रक्रिया को समझाने के लिए सबसे आधुनिक और सर्वमान्य सिद्धांत 'सक्रिय पोटैशियम आयन स्थानांतरण सिद्धांत' (Active K⁺ ion Transport Theory) है, जिसे लेविट (Levitt, 1974) ने प्रस्तुत किया था।

दिन के समय रंध्रों का खुलना (Opening of Stomata in Daylight):

  1. प्रकाश की उपस्थिति में द्वार कोशिकाओं के हरितलवक प्रकाश संश्लेषण करते हैं, जिससे CO₂ की सांद्रता कम हो जाती है और pH बढ़ जाता है।
  2. स्टार्च (Starch) का फॉस्फोराइलेज (Phosphorylase) एंजाइम की उपस्थिति में मैलिक अम्ल (Malic Acid) में रूपांतरण होता है।
  3. मैलिक अम्ल वियोजित होकर मैलेट आयन (Malate) और हाइड्रोजन आयन (H⁺) बनाता है: $$ \text{Malic Acid} \rightleftharpoons \text{Malate}^{2-} + 2H^+ $$
  4. द्वार कोशिकाओं से H⁺ आयन बाहर (सहायक कोशिकाओं में) पंप किए जाते हैं, और इसके बदले में K⁺ आयन (पोटैशियम आयन) सक्रिय रूप से (ATP का उपयोग करके) द्वार कोशिकाओं के अंदर प्रवेश करते हैं।
  5. द्वार कोशिकाओं के अंदर K⁺ आयन मैलेट के साथ मिलकर पोटैशियम मैलेट (Potassium Malate) बनाते हैं, जो रिक्तिका (Vacuole) में संचित हो जाता है।
  6. पोटैशियम मैलेट के संचय से द्वार कोशिकाओं का परासरण दाब (Osmotic Pressure - OP) और विसरण दाब न्यूनता (DPD) बढ़ जाती है।
  7. आसपास की कोशिकाओं से जल अंतःपरासरण (Endosmosis) द्वारा द्वार कोशिकाओं में प्रवेश करता है। स्फीति दाब (Turgor Pressure) बढ़ता है और रंध्र खुल जाते हैं।

रात के समय रंध्रों का बंद होना (Closing of Stomata in Dark):

  1. प्रकाश की अनुपस्थिति में CO₂ का स्तर बढ़ जाता है, जिससे pH कम हो जाता है।
  2. एब्सिसिक अम्ल (Abscisic Acid - ABA) नामक पादप हार्मोन सक्रिय हो जाता है, जो K⁺ आयनों को बाहर निकलने के लिए प्रेरित करता है और उनके प्रवेश को रोकता है।
  3. K⁺ आयनों के बाहर जाने से द्वार कोशिकाओं का परासरण दाब (OP) कम हो जाता है।
  4. जल बहिःपरासरण (Exosmosis) द्वारा द्वार कोशिकाओं से बाहर निकल जाता है, वे शिथिल (Flaccid) हो जाती हैं, और रंध्र बंद हो जाते हैं।

4. वाष्पोत्सर्जन की दर को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Rate of Transpiration)

वाष्पोत्सर्जन की दर पर्यावरणीय (External) और पौधे के आंतरिक (Internal) दोनों प्रकार के कारकों द्वारा नियंत्रित होती है।

A. बाह्य या पर्यावरणीय कारक (External Factors)

  • प्रकाश (Light): प्रकाश वाष्पोत्सर्जन को सर्वाधिक प्रभावित करता है क्योंकि यह रंध्रों के खुलने को प्रेरित करता है। प्रकाश तापमान को भी बढ़ाता है, जिससे वाष्पीकरण की दर बढ़ती है।
  • तापमान (Temperature): तापमान में वृद्धि से पत्तियों के भीतर और बाहर के बीच जलवाष्प की प्रवणता (Vapor pressure gradient) बढ़ जाती है, अतः वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है।
  • आपेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity): वाष्पोत्सर्जन की दर वायुमंडल की आपेक्षिक आर्द्रता के व्युत्क्रमानुपाती (Inversely proportional) होती है। नम हवा में वाष्पोत्सर्जन दर कम होती है। $$ \text{Rate of Transpiration} \propto \frac{1}{\text{Relative Humidity}} $$
  • वायु की गति (Wind Speed): हवा के बहने से पत्ती की सतह से जलवाष्प हटती रहती है, जिससे वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ती है। हालांकि, आंधी (Very high wind speed) चलने पर रंध्र बंद हो जाते हैं और वाष्पोत्सर्जन घट जाता है।
  • मृदा जल की उपलब्धता (Available Soil Water): यदि मिट्टी में जल की कमी हो, तो जड़ों द्वारा जल का अवशोषण कम हो जाता है, जिससे पौधे मुरझाने (Wilting) लगते हैं और वाष्पोत्सर्जन की दर स्वतः कम हो जाती है।

B. आंतरिक या पादप कारक (Internal Factors)

  • पत्ती का क्षेत्रफल (Leaf Area): बड़ी पत्तियों में अधिक रंध्र होते हैं, अतः वाष्पोत्सर्जन अधिक होता है।
  • रंध्रों की संख्या और वितरण (Number and Distribution of Stomata): रंध्रों की आवृत्ति जितनी अधिक होगी, वाष्पोत्सर्जन दर उतनी ही तीव्र होगी।
  • मूल-प्ररोह अनुपात (Root-Shoot Ratio): यदि जड़ तंत्र विस्तृत है (जल अवशोषण अधिक) और प्ररोह छोटा है, तो वाष्पोत्सर्जन की दर अधिक होगी।
  • पत्ती की संरचनात्मक विशेषताएं: मोटी क्यूटिकल (Thick cuticle), मोम का आवरण, और धंसे हुए रंध्र (Sunken stomata) मरुद्भिद (Xerophytes) पौधों में वाष्पोत्सर्जन को कम करने के लिए अनुकूलन हैं।

5. परीक्षा केंद्रित महत्वपूर्ण तथ्य और अपवाद (Key Exam Takeaways)

वाष्पोत्सर्जन-रोधी (Anti-transpirants): ये वे रासायनिक पदार्थ हैं जिनका छिड़काव पत्तियों पर करने से वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है, लेकिन ये प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित नहीं करते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए इनके नाम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
  • फिनाइल मर्क्यूरिक एसीटेट (PMA - Phenyl Mercuric Acetate)
  • एब्सिसिक अम्ल (Abscisic Acid - ABA)
  • एस्पिरिन (Aspirin)
  • सिलिकॉन तेल (Silicon Oil) - जो पत्ती पर एक पतली पारगम्य फिल्म बनाता है।
कोबाल्ट क्लोराइड परीक्षण (Cobalt Chloride Test): वाष्पोत्सर्जन को प्रदर्शित करने और मापने के लिए $CoCl_2$ पेपर का उपयोग किया जाता है। यह सूखा होने पर नीले (Blue) रंग का होता है, लेकिन नमी (Transpiration vapour) के संपर्क में आने पर यह गुलाबी/लाल (Pink) हो जाता है।
पोटोमीटर (Potometer): वाष्पोत्सर्जन की दर को मापने के लिए जिस उपकरण का उपयोग किया जाता है, उसे पोटोमीटर कहते हैं (उदाहरण: गैनांग का पोटोमीटर / Ganong's Potometer)। यह उपकरण वास्तव में वाष्पोत्सर्जन की दर नहीं मापता, बल्कि पौधे द्वारा अवशोषित जल की दर (Rate of water absorption) मापता है, जो वाष्पोत्सर्जन की दर के लगभग बराबर होती है।
वाष्पोत्सर्जन और बिंदुस्राव (Transpiration vs Guttation) में मुख्य अंतर: वाष्पोत्सर्जन में जल वाष्प (Vapor) के रूप में रंध्रों (Stomata) से निकलता है और यह शुद्ध जल होता है। जबकि बिंदुस्राव (Guttation) में जल द्रव (Liquid drops) के रूप में पत्तियों के किनारों पर स्थित जलरंध्रों (Hydathodes) से निकलता है, और इसमें अकार्बनिक एवं कार्बनिक लवण घुले होते हैं। बिंदुस्राव मुख्य रूप से मूल दाब (Root Pressure) के कारण होता है।